أتيت أشكو..
إليك يا صديقي..
مما يعتريني..
من ضجر وضيق.
فقد تداع إلى..
موج الذكريات..
عندما مررت..
بذاك البيت العتيق.
فكرت لحظة..
عشت فيها..
تخالج القهر..
وحزن القلب من عشيق.
خف حسه..
عن ذاك المنزل..
وسقط المنية..
من قلب رقيق.
لم يحتمل..
الهجر مني لأمر..
لا أذكره..
يا لي من رجل صفيق.
عندما كنت..
أملك قلبه..
أهيمن على زفيره..
وفي نفس الشهيق.
تجده ينال..
من عشقي بقدر..
ليته يرجع..
وأسقيه كل الرحيق.
من أين لي..
قناة روش

يعشقه الطاهر..
بحبه الوافي..
وعيناه تلمع من بريق.
ما أغناني التكبر..
حين هجرته..
اتبختر..
كمشية طائر البطريق.
فنظر بشرت..
إلى.. الصديق قائلا..
افترق عني..
وأذهب لذاك الطريق.